प्रिय परीक्षित्! सर्वसमर्थ कश्यपजीने इस प्रकार मन-ही-मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दितिसे कहा॥ ४४॥
इति संचिन्त्य भगवान्मारीचः कुरुनन्दन।
उवाच किञ्चित् कुपित आत्मानं च विगर्हयन्॥ ४४
प्रिय परीक्षित्! सर्वसमर्थ कश्यपजीने इस प्रकार मन-ही-मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दितिसे कहा॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 796) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/44/