अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये। इन्द्रने भी सौतेली माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया॥ ६७॥✎ 553
सजूरिन्द्रेण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन्।
व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः॥ ६७
अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये। इन्द्रने भी सौतेली माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया॥ ६७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.67 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 799) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/18/67/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)