श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.71

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इन्द्र उवाच

अम्ब तेऽहं व्यवसितमुपधार्यागतोऽन्तिकम्।

लब्धान्तरोऽच्छिदं गर्भमर्थबुद्धिर्न धर्मवित्॥ ७१

amba te'haṃ vyavasitamupadhāryāgato'ntikam|

labdhāntaro'cchidaṃ garbhamarthabuddhirna dharmavit|| 71

अर्थ

इन्द्रने कहा—माता! मुझे इस बातका पता चल गया था कि तुम किस उद्देश्यसे व्रत कर रही हो। इसीलिये अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मैं स्वर्ग छोड़कर तुम्हारे पास आया। मेरे मनमें तनिक भी धर्मभावना नहीं थी। इसीसे तुम्हारे व्रतमें त्रुटि होते ही मैंने उस गर्भके टुकड़े-टुकड़े कर दिये॥ ७१॥

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