श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिनौजसा।

जुष्ट ईश गुणैः सर्वैस्ततोऽसि भगवान् प्रभुः॥ ५

yathā tvaṃ kṛpayā bhūtyā tejasā mahinaujasā|

juṣṭa īśa guṇaiḥ sarvaistato'si bhagavān prabhuḥ|| 5

अर्थ

मेरे आराध्यदेव! आप कृपा, विभूति, तेज, महिमा और वीर्य आदि समस्त गुणोंसे नित्ययुक्त हैं। इन्हीं भगों—ऐश्‍वर्योंसे नित्ययुक्त रहनेके कारण आपको भगवान् कहते हैं। आप सर्वशक्तिमान् हैं॥ ५॥✎ 556

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #556 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें