श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.14

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।

वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥ १४

sāṅketyaṃ pārihāsyaṃ vā stobhaṃ helanameva vā|

vaikuṇṭhanāmagrahaṇamaśeṣāghaharaṃ viduḥ|| 14

अर्थ

बड़े-बड़े महात्मा पुरुष यह बात जानते हैं कि संकेतमें (किसी दूसरे अभिप्रायसे), परिहासमें, तान अलापनेमें अथवा किसीकी अवहेलना करनेमें भी यदि कोई भगवान्‌के नामोंका उच्चारण करता है तो, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १४॥

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