श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भक्तिमान् भगवत्याशु माहात्म्यश्रवणाद्धरेः।

अनुतापो महानासीत्स्मरतोऽशुभमात्मनः॥ २५

bhaktimān bhagavatyāśu māhātmyaśravaṇāddhareḥ|

anutāpo mahānāsītsmarato'śubhamātmanaḥ|| 25

अर्थ

सर्वपापापहारी भगवान्‌की महिमा सुननेसे अजामिलके हृदयमें शीघ्र ही भक्तिका उदय हो गया। अब उसे अपने पापोंको याद करके बड़ा पश्चात्ताप होने लगा॥ २५॥✎ 497

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #497 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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