धिक्कार है! मुझे बार-बार धिक्कार है! मैं संतोंके द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ! मैंने अपने कुलमें कलंकका टीका लगा दिया! हाय-हाय, मैंने अपनी सती एवं अबोध पत्नीका परित्याग कर दिया और शराब पीनेवाली कुलटाका संसर्ग किया॥ २७॥✎ 497
धिङ्मां विगर्हितं सद्भिर्दुष्कृतं कुलकज्जलम्।
हित्वा बालां सतीं योऽहं सुरापामसतीमगाम्॥ २७
धिक्कार है! मुझे बार-बार धिक्कार है! मैं संतोंके द्वारा निन्दित हूँ, पापात्मा हूँ! मैंने अपने कुलमें कलंकका टीका लगा दिया! हाय-हाय, मैंने अपनी सती एवं अबोध पत्नीका परित्याग कर दिया और शराब पीनेवाली कुलटाका संसर्ग किया॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.2.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 709) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/2/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)