श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.47

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

य एवं परमं गुह्यमितिहासमघापहम्।

शृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो यश्‍च भक्‍त्यानुकीर्तयेत्॥ ४७

ya evaṃ paramaṃ guhyamitihāsamaghāpaham|

śṛṇuyācchraddhayā yukto yaśca bhaktyānukīrtayet|| 47

अर्थ

परीक्षित्! यह इतिहास अत्यन्त गोपनीय और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। जो पुरुष श्रद्धा और भक्तिके साथ इसका श्रवण-कीर्तन करता है, वह नरकमें कभी नहीं जाता। यमराजके दूत तो आँख उठाकर उसकी ओर देखतक नहीं सकते। उस पुरुषका जीवन चाहे पापमय ही क्यों न रहा हो, वैकुण्ठलोकमें उसकी पूजा होती है॥ ४७-४८॥

यह अर्थ श्लोक 47–48 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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