श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्ते

सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम्।

ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषां

स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरुगायवादः॥ २६

evaṃ vimṛśya sudhiyo bhagavatyanante

sarvātmanā vidadhate khalu bhāvayogam|

te me na daṇḍamarhantyatha yadyamīṣāṃ

syāt pātakaṃ tadapi hantyurugāyavādaḥ|| 26

अर्थ

प्रिय दूतो! बुद्धिमान् पुरुष ऐसा विचार कर भगवान् अनन्तमें ही सम्पूर्ण अन्तःकरणसे अपना भक्तिभाव स्थापित करते हैं। वे मेरे दण्डके पात्र नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं, परन्तु यदि कदाचित् संयोगवश कोई पाप बन भी जाय, तो उसे भगवान्का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है॥ २६॥

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