श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.31

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तस्मात् सङ्कीर्तनं विष्णोर्जगन्मङ्गलमंहसाम्।

महतामपि कौरव्य विद्ध्यैकान्तिकनिष्कृतिम्॥ ३१

tasmāt saṅkīrtanaṃ viṣṇorjaganmaṅgalamaṃhasām|

mahatāmapi kauravya viddhyaikāntikaniṣkṛtim|| 31

अर्थ

[श्रीशुकदेवजी कहते हैं—] परीक्षित्! इसलिये तुम ऐसा समझ लो कि बड़े-से-बड़े पापोंका सर्वोत्तम, अन्तिम और पाप-वासनाओंको भी निर्मूल कर डालनेवाला प्रायश्चित्त यही है कि केवल भगवान्‌के गुणों, लीलाओं और नामोंका कीर्तन किया जाय। इसीसे संसारका कल्याण हो सकता है॥ ३१॥

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