॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.3.33
कृष्णाङ्घ्रिपद्ममधुलिण् न पुनर्विसृष्ट-
मायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु।
अन्यस्तु कामहत आत्मरजः प्रमार्ष्टु-
मीहेत कर्म यत एव रजः पुनः स्यात्॥ ३३
kṛṣṇāṅghripadmamadhuliṇ na punarvisṛṣṭa-
māyāguṇeṣu ramate vṛjināvaheṣu|
anyastu kāmahata ātmarajaḥ pramārṣṭu-
mīheta karma yata eva rajaḥ punaḥ syāt|| 33
अर्थ
जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्द-मकरन्द-रसका लोभी भ्रमर है, वह स्वभावसे ही मायाके आपातरम्य, दुःखद और पहलेसे ही छोड़े हुए विषयोंमें फिर नहीं रमता। किन्तु जो लोग उस दिव्य रससे विमुख हैं, कामनाओंने जिनकी विवेकबुद्धिपर पानी फेर दिया है, वे अपने पापोंका मार्जन करनेके लिये पुनः प्रायश्चित्तरूप कर्म ही करते हैं। इससे होता यह है कि उनके कर्मोंकी वासना मिटती नहीं और वे फिर वैसे ही दोष कर बैठते है॥ ३३॥