श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.12

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तोकानां२ पितरौ बन्धू दृशः पक्ष्म स्त्रियाः पतिः।

पतिः प्रजानां भिक्षूणां गृह्यज्ञानां बुधः सुहृत्॥ १२

tokānāṃ pitarau bandhū dṛśaḥ pakṣma striyāḥ patiḥ|

patiḥ prajānāṃ bhikṣūṇāṃ gṛhyajñānāṃ budhaḥ suhṛt|| 12

अर्थ

जैसे माँ-बाप बालकोंकी, पलकें नेत्रोंकी, पति पत्नीकी, गृहस्थ भिक्षुकोंकी और ज्ञानी अज्ञानियोंकी रक्षा करते हैं और उनका हित चाहते हैं—वैसे ही प्रजाकी रक्षा और हितका उत्तरदायी राजा होता है॥ १२॥✎ 507 508

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—लोकानां पितरौ।

    (मुद्रित पृष्ठ 718)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #507 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #508 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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