जब उन्होंने देखा कि वह सृष्टि बढ़ नहीं रही है, तब उन्होंने विन्ध्याचलके निकटवर्ती पर्वतोंपर जाकर बड़ी घोर तपस्या की॥ २०॥✎ 509510
तमबृंहितमालोक्य प्रजासर्गं प्रजापतिः।
विन्ध्यपादानुपव्रज्य सोऽचरद् दुष्करं तपः॥ २०
जब उन्होंने देखा कि वह सृष्टि बढ़ नहीं रही है, तब उन्होंने विन्ध्याचलके निकटवर्ती पर्वतोंपर जाकर बड़ी घोर तपस्या की॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 719) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/4/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)