श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा

नात्मानमन्यं च विदुः परं यत्।

सर्वं पुमान् वेद गुणांश्‍च तज्ज्ञो

न वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे॥ २५

deho'savo'kṣā manavo bhūtamātrā

nātmānamanyaṃ ca viduḥ paraṃ yat|

sarvaṃ pumān veda guṇāṃśca tajjño

na veda sarvajñamanantamīḍe|| 25

अर्थ

देह, प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरणकी वृत्तियाँ, पंचमहाभूत और उनकी तन्मात्राएँ—ये सब जड होनेके कारण अपनेको और अपनेसे अतिरिक्तको भी नहीं जानते। परन्तु जीव इन सबको और इनके कारण सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणोंको भी जानता है। परन्तु वह भी दृश्य अथवा ज्ञेयरूपसे आपको नहीं जान सकता। क्योंकि आप ही सबके ज्ञाता और अनन्त हैं। इसलिये प्रभो! मैं तो केवल आपकी स्तुति करता हूँ॥ २५॥

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