प्रिय दक्ष! मैं अनन्त गुणोंका आधार एवं स्वयं अनन्त हूँ। जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड-शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्न हुए॥ ४८॥✎ 512
मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतो गुणविग्रहः।
यदाऽऽसीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः॥ ४८
प्रिय दक्ष! मैं अनन्त गुणोंका आधार एवं स्वयं अनन्त हूँ। जब गुणमयी मायाके क्षोभसे यह ब्रह्माण्ड-शरीर प्रकट हुआ, तब इसमें अयोनिज आदिपुरुष ब्रह्मा उत्पन्न हुए॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 723) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/4/48/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#512 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने