श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.1

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

श्रीनारदजीके उपदेशसे दक्षपुत्रोंकी विरक्ति तथा नारदजीको दक्षका शाप

श्रीशुक उवाच

तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः।

हर्यश्‍वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद् विभुः॥ १

tasyāṃ sa pāñcajanyāṃ vai viṣṇumāyopabṛṃhitaḥ|

haryaśvasaṃjñānayutaṃ putrānajanayad vibhuḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के शक्तिसंचारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पंचजनकी पुत्री असिक्‍नीसे हर्यश्‍व नामके दस हजार पुत्र उत्पन्‍न किये॥ १॥

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