श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तत्सङ्गभ्रंशितैश्‍वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत्।

तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १५

tatsaṅgabhraṃśitaiśvaryaṃ saṃsarantaṃ kubhāryavat|

tadgatīrabudhasyeha kimasatkarmabhirbhavet|| 15

अर्थ

यह बुद्धि ही कुलटा स्त्रीके समान है। इसके संगसे जीवरूप पुरुषका ऐश्‍वर्य—इसकी स्वतन्त्रता नष्ट हो गयी है। इसीके पीछे-पीछे वह कुलटा स्त्रीके पतिकी भाँति न जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है। इसकी विभिन्‍न गतियों, चालोंको जाने बिना ही विवेकरहित कर्मोंसे क्या सिद्धि मिलेगी?॥ १५॥

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