श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणम् २।

अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १७

pañcaviṃśatitattvānāṃ puruṣo'dbhutadarpaṇam |

adhyātmamabudhasyeha kimasatkarmabhirbhavet|| 17

अर्थ

ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर है। पुरुष उनका आश्‍चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत‍्का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—दर्शनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 726)

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