ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर है। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत्का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं॥ १७॥
पञ्चविंशतितत्त्वानां पुरुषोऽद्भुतदर्पणम् ।
अध्यात्ममबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १७
ये पचीस तत्त्व ही एक अद्भुत घर है। पुरुष उनका आश्चर्यमय आश्रय है। वही समस्त कार्य-कारणात्मक जगत्का अधिष्ठाता है। यह बात न जानकर सच्चा स्वातन्त्र्य प्राप्त किये बिना झूठी स्वतन्त्रतासे किये जानेवाले कर्म व्यर्थ ही हैं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 726) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/5/17/