श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.19

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कालचक्रं भ्रमिस्तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत्।

स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत्॥ १९

kālacakraṃ bhramistīkṣṇaṃ sarvaṃ niṣkarṣayajjagat|

svatantramabudhasyeha kimasatkarmabhirbhavet|| 19

अर्थ

यह काल ही एक चक्र है। यह निरन्तर घूमता रहता है। इसकी धार छुरे और वज्रके समान तीखी है और यह सारे जगत‍्को अपनी ओर खींच रहा है। इसको रोकनेवाला कोई नहीं, यह परम स्वतन्त्र है। यह बात न जानकर कर्मोंके फलको नित्य समझकर जो लोग सकामभावसे उनका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें उन अनित्य कर्मोंसे क्या लाभ होगा?॥ १९॥

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