इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्ममें—संगीतलहरीमें अभिव्यक्त हुए, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंमें अपने चित्तको अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक-लोकान्तरोंमें विचरने लगे॥ २२॥
स्वरब्रह्मणि निर्भातहृषीकेशपदाम्बुजे।
अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः॥ २२
इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्ममें—संगीतलहरीमें अभिव्यक्त हुए, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंमें अपने चित्तको अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक-लोकान्तरोंमें विचरने लगे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 727) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/5/22/