श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.41

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नानुभूय न जानाति पुमान् विषयतीक्ष्णताम्।

निर्विद्येत स्वयं तस्मान्‍न तथा भिन्‍नधीः परैः॥ ४१

nānubhūya na jānāti pumān viṣayatīkṣṇatām|

nirvidyeta svayaṃ tasmānna tathā bhinnadhīḥ paraiḥ|| 41

अर्थ

नारद! मनुष्य विषयोंका अनुभव किये बिना उनकी कटुता नहीं जान सकता। इसलिये उनकी दुःखरूपताका अनुभव होनेपर स्वयं जैसा वैराग्य होता है, वैसा दूसरोंके बहकानेसे नहीं होता॥ ४१॥

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