॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.7.23
मघवन् द्विषतः पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात्।
सम्प्रत्युपचितान् भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः।
आददीरन् निलयनं ममापि भृगुदेवताः॥ २३
maghavan dviṣataḥ paśya prakṣīṇān gurvatikramāt|
sampratyupacitān bhūyaḥ kāvyamārādhya bhaktitaḥ|
ādadīran nilayanaṃ mamāpi bhṛgudevatāḥ|| 23
अर्थ
देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परन्तु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन-जनसे सम्पन्न हो गये हैं। देवताओ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे॥ २३॥