श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.8

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्।

नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्‍नपि सभागतम्॥ ८

vācaspatiṃ munivaraṃ surāsuranamaskṛtam|

noccacālāsanādindraḥ paśyannapi sabhāgatam|| 8

अर्थ

इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये। उन्हें सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं। इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परन्तु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरुका सत्कार ही किया। यहाँतक कि वे अपने आसनसे हिले-डुलेतक नहीं॥ ७-८॥

यह अर्थ श्लोक 7–8 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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