क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्॥ १
yayā guptaḥ sahasrākṣaḥ savāhān ripusainikān|
krīḍanniva vinirjitya trilokyā bubhuje śriyam|| 1
अर्थ
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! देवराज इन्द्रने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओंकी चतुरंगिणी सेनाको खेल-खेलमें—अनायास ही जीतकर त्रिलोकीकी राजलक्ष्मीका उपभोग किया, आप उस नारायणकवचको मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमिमें किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओंपर विजय प्राप्त की॥ १-२॥
यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्॥ १
राजा परीक्षित्ने पूछा—भगवन्! देवराज इन्द्रने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओंकी चतुरंगिणी सेनाको खेल-खेलमें—अनायास ही जीतकर त्रिलोकीकी राजलक्ष्मीका उपभोग किया, आप उस नारायणकवचको मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमिमें किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओंपर विजय प्राप्त की॥ १-२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.8.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 738) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/8/1/