॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.8.17
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात्॥ १७
sanatkumāro'vatu kāmadevā-
ddhayaśīrṣā māṃ pathi devahelanāt|
devarṣivaryaḥ puruṣārcanāntarāt
kūrmo harirmāṃ nirayādaśeṣāt|| 17
अर्थ
परमर्षि सनत्कुमार कामदेवसे, हयग्रीवभगवान् मार्गमें चलते समय देवमूर्तियोंको नमस्कार आदि न करनेके अपराधसे, देवर्षि नारद सेवापराधोंसे* और भगवान् कच्छप सब प्रकारके नरकोंसे मेरी रक्षा करें॥ १७॥
टिप्पणियाँ
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बत्तीस प्रकारके सेवापराध माने गये हैं—१-सवारीपर चढ़कर अथवा पैरोंमें खड़ाऊँ पहनकर श्रीभगवान्के मन्दिरमें जाना। २-रथयात्रा, जन्माष्टमी आदि उत्सवोंका न करना या उनके दर्शन न करना। ३-श्रीमूर्तिके दर्शन करके प्रणाम न करना। ४-अशुचि-अवस्थामें दर्शन करना। ५-एक हाथसे प्रणाम करना। ६-परिक्रमा करते समय भगवान्के सामने आकर कुछ न रुककर फिर परिक्रमा करना अथवा केवल सामने ही परिक्रमा करते रहना। ७-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने पैर पसारकर बैठना। ८-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने दोनों घुटनोंको ऊँचा करके उनको हाथोंसे लपेटकर बैठ जाना। ९-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने सोना। १०-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने भोजन करना। ११-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने झूठ बोलना। १२-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने जोरसे बोलना। १३-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने आपसमें बातचीत करना। १४-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने चिल्लाना। १५-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने कलह करना। १६-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने किसीको पीड़ा देना। १७-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने किसीपर अनुग्रह करना। १८-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने किसीको निष्ठुर वचन बोलना। १९-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने कम्बलसे सारा शरीर ढक लेना। २०-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने दूसरेकी निन्दा करना। २१-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने दूसरेकी स्तुति करना। २२-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने अश्लील शब्द बोलना। २३-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने अधोवायुका त्याग करना। २४-शक्ति रहते हुए भी गौण अर्थात् सामान्य उपचारोंसे भगवान्की सेवा-पूजा करना। २५-श्रीभगवान्को निवेदित किये बिना किसी भी वस्तुका खाना-पीना। २६-जिस ऋतुमें जो फल हो, उसे सबसे पहले श्रीभगवान्को न चढ़ाना। २७-किसी शाक या फलादिके अगले भागको तोड़कर भगवान्के व्यंजनादिके लिये देना। २८-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहको पीठ देकर बैठना। २९-श्रीभगवान्के श्रीविग्रहके सामने दूसरे किसीको भी प्रणाम करना। ३०-गुरुदेवकी अभ्यर्थना, कुशल-प्रश्न और उनका स्तवन न करना और ३१-अपने मुखसे अपनी प्रशंसा करना। ३२-किसी भी देवताकी निन्दा करना।