श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नारायणमयं वर्म सन्‍नह्येद् भय आगते।

पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि॥ ५

nārāyaṇamayaṃ varma sannahyed bhaya āgate|

pādayorjānunorūrvorudare hṛdyathorasi|| 5

अर्थ

विश्‍वरूपने कहा—देवराज इन्द्र! भयका अवसर उपस्थित होनेपर नारायणकवच धारण करके अपने शरीरकी रक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी विधि यह है कि पहले हाथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथमें कुशकी पवित्री धारण करके उत्तर मुँह बैठ जाय। इसके बाद कवचधारणपर्यन्त और कुछ न बोलनेका निश्‍चय करके पवित्रतासे ‘ॐ नमो नारायणाय’ और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इन मन्त्रोंके द्वारा हृदयादि अंगन्यास तथा अंगुष्ठादि करन्यास करे। पहले ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर मन्त्रके ॐ आदि आठ अक्षरोंका क्रमशः पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिरमें न्यास करे। अथवा पूर्वोक्त मन्त्रके मकारसे लेकर ॐकारपर्यन्त आठ अक्षरोंका सिरसे आरम्भ करके उन्हीं आठ अंगोंमें विपरीत क्रमसे न्यास करे ॥ ४—६॥

यह अर्थ श्लोक 4–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें