श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अविस्मितं तं परिपूर्णकामं

स्वेनैव लाभेन समं प्रशान्तम्।

विनोपसर्पत्यपरं हि बालिशः

श्‍वलाङ्गुलेनातितितर्ति सिन्धुम्॥ २२

avismitaṃ taṃ paripūrṇakāmaṃ

svenaiva lābhena samaṃ praśāntam|

vinopasarpatyaparaṃ hi bāliśaḥ

śvalāṅgulenātititarti sindhum|| 22

अर्थ

प्रभो! आपके लिये कोई नयी बात न होनेके कारण कुछ भी देखकर आप विस्मित नहीं होते। आप अपने स्वरूपके साक्षात्कारसे ही सर्वथा पूर्णकाम, सम एवं शान्त हैं। जो आपको छोड़कर किसी दूसरेकी शरण लेता है, वह मूर्ख है। वह मानो कुत्तेकी पूँछ पकड़कर समुद्र पार करना चाहता है॥ २२॥✎ 519 520

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #519 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #520 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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