श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.31

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

देवा ऊचुः

नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः।

नमस्ते ह्यस्तचक्राय नमः सुपुरुहूतये॥ ३१

namaste yajñavīryāya vayase uta te namaḥ|

namaste hyastacakrāya namaḥ supuruhūtaye|| 31

अर्थ

देवताओंने कहा—भगवन्! यज्ञमें स्वर्गादि देनेकी शक्ति तथा उनके फलकी सीमा निश्चित करनेवाले काल भी आप ही हैं। यज्ञमें विघ्न डालनेवाले दैत्योंको आप चक्रसे छिन्‍न-भिन्‍न कर डालते हैं। इसलिये आपके नामोंकी कोई सीमा नहीं है। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं॥ ३१॥

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