श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ॐ नमस्तेऽस्तु भगवन् नारायण वासुदेव आदिपुरुष महापुरुष महानुभाव परममङ्गल परमकल्याण परमकारुणिक केवल जगदाधार लोकैकनाथ सर्वेश्‍वर लक्ष्मीनाथ परमहंसपरिव्राजकैः परमेण आत्मयोगसमाधिना परिभावितपरिस्फुटपारमहंस्यधर्मेणोद्घाटिततमःकपाटद्वारे चित्तेऽपावृत आत्मलोके स्वयमुपलब्धनिजसुखानुभवो भवान्॥ ३३॥

oṃ namaste'stu bhagavan nārāyaṇa vāsudeva ādipuruṣa mahāpuruṣa mahānubhāva paramamaṅgala paramakalyāṇa paramakāruṇika kevala jagadādhāra lokaikanātha sarveśvara lakṣmīnātha paramahaṃsaparivrājakaiḥ parameṇa ātmayogasamādhinā paribhāvitaparisphuṭapāramahaṃsyadharmeṇodghāṭitatamaḥkapāṭadvāre citte'pāvṛta ātmaloke svayamupalabdhanijasukhānubhavo bhavān|| 33||

अर्थ

भगवन्! नारायण! वासुदेव! आप आदि पुरुष (जगत‍्के परम कारण) और महापुरुष (पुरुषोत्तम) हैं। आपकी महिमा असीम है। आप परम मंगलमय, परम कल्याण-स्वरूप और परम दयालु हैं। आप ही सारे जगत‍्के आधार एवं अद्वितीय हैं, केवल आप ही सारे जगत‍्के स्वामी हैं। आप सर्वेश्‍वर हैं तथा सौन्दर्य और मृदुलताकी अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीके परम पति हैं। प्रभो! परमहंस परिव्राजक विरक्त महात्मा जब आत्मसंयमरूप परम समाधिसे भलीभाँति आपका चिन्तन करते हैं, तब उनके शुद्ध हृदयमें परमहंसोंके धर्म वास्तविक भगवद्भजनका उदय होता है। इससे उनके हृदयके अज्ञानरूप किवाड़ खुल जाते हैं और उनके आत्मलोकमें आप आत्मानन्दके रूपमें बिना किसी आवरणके प्रकट हो जाते हैं और वे आपका अनुभव करके निहाल हो जाते हैं। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं॥ ३३॥

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