श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.46

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

अथैवमीडितो राजन् सादरं त्रिदशैर्हरिः।

स्वमुपस्थानमाकर्ण्य प्राह तानभिनन्दितः॥ ४६

athaivamīḍito rājan sādaraṃ tridaśairhariḥ|

svamupasthānamākarṇya prāha tānabhinanditaḥ|| 46

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने बड़े आदरके साथ इस प्रकार भगवान्का स्तवन किया, तब वे अपनी स्तुति सुनकर बहुत प्रसन्‍न हुए तथा उनसे कहने लगे॥ ४६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें