श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.31

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कतमोऽपि न वेनः स्यात्पञ्चानां पुरुषं प्रति।

तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत्॥ ३१

katamo'pi na venaḥ syātpañcānāṃ puruṣaṃ prati|

tasmāt kenāpyupāyena manaḥ kṛṣṇe niveśayet|| 31

अर्थ

भक्तोंके अतिरिक्त जो पाँच प्रकारके भगवान्‌का चिन्तन करनेवाले हैं, उनमेंसे राजा वेनकी तो किसीमें भी गणना नहीं होती (क्योंकि उसने किसी भी प्रकारसे भगवान्‌में मन नहीं लगाया था )। सारांश यह कि चाहे जैसे हो, अपना मन भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय कर देना चाहिये॥ ३१॥✎ 571 572 573 574 575 576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #573 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #574 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #575 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #576 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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