राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! भगवान्के पार्षदोंको भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था? भगवान्के अनन्य प्रेमी फिर जन्म-मृत्युमय संसारमें आयें, यह बात तो कुछ अविश्वसनीय-सी मालूम पड़ती है॥ ३३॥
कीदृशः कस्य वा शापो हरिदासाभिमर्शनः।
अश्रद्धेय इवाभाति हरेरेकान्तिनां भवः॥ ३३
राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! भगवान्के पार्षदोंको भी प्रभावित करनेवाला वह शाप किसने दिया था तथा वह कैसा था? भगवान्के अनन्य प्रेमी फिर जन्म-मृत्युमय संसारमें आयें, यह बात तो कुछ अविश्वसनीय-सी मालूम पड़ती है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 809) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/1/33/