श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.45

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तावेव क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव।

अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ॥ ४५

tāveva kṣatriyau jātau mātṛṣvasrātmajau tava|

adhunā śāpanirmuktau kṛṣṇacakrahatāṃhasau|| 45

अर्थ

वे ही दोनों जय-विजय इस जन्ममें तुम्हारी मौसीके लड़के शिशुपाल और दन्तवक्‍त्रके रूपमें क्षत्रियकुलमें उत्पन्‍न हुए थे। भगवान् श्रीकृष्णके चक्रका स्पर्श प्राप्त हो जानेसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये और वे सनकादिके शापसे मुक्त हो गये॥ ४५॥

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