युधिष्ठिरजीने पूछा—भगवन्! हिरण्यकशिपुने अपने स्नेहभाजन पुत्र प्रह्लादसे इतना द्वेष क्यों किया? फिर प्रह्लाद तो महात्मा थे। साथ ही यह भी बतलाइये कि किस साधनसे प्रह्लाद भगवन्मय हो गये॥ ४७॥
विद्वेषो दयिते पुत्रे कथमासीन्महात्मनि।
ब्रूहि मे भगवन्येन प्रह्रादस्याच्युतात्मता॥ ४७
युधिष्ठिरजीने पूछा—भगवन्! हिरण्यकशिपुने अपने स्नेहभाजन पुत्र प्रह्लादसे इतना द्वेष क्यों किया? फिर प्रह्लाद तो महात्मा थे। साथ ही यह भी बतलाइये कि किस साधनसे प्रह्लाद भगवन्मय हो गये॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 810) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/1/47/