॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.10.50
न यस्य साक्षाद् भवपद्मजादिभी
रूपं धिया वस्तुतयोपवर्णितम्४।
मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितः
प्रसीदतामेष स सात्वतां पतिः॥ ५०
na yasya sākṣād bhavapadmajādibhī
rūpaṃ dhiyā vastutayopavarṇitam|
maunena bhaktyopaśamena pūjitaḥ
prasīdatāmeṣa sa sātvatāṃ patiḥ|| 50
अर्थ
शंकर, ब्रह्मा आदि भी अपनी सारी बुद्धि लगाकर ‘वे यह हैं’—इस रूपमें उनका वर्णन नहीं कर सके, फिर हम तो कर ही कैसे सकते हैं। हम तो मौन, भक्ति और संयमके द्वारा ही उनकी पूजा करते हैं। कृपया हमारी यह पूजा स्वीकार करके भक्तवत्सल भगवान् हमपर प्रसन्न हों॥ ५०॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—वस्तु तदानुव०।