कमलनयन! जिस समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है॥ ९॥
विमुञ्चति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान्।
तर्ह्येव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते॥ ९
कमलनयन! जिस समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 868) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/10/9/