श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.1

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथैकादशोऽध्यायः

मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्मका निरूपण

श्रीशुक उवाच

श्रुत्वेहितं साधुसभासभाजितं

महत्तमाग्रण्य उरुक्रमात्मनः।

युधिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदा युतः

पप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुवः॥ १

śrutvehitaṃ sādhusabhāsabhājitaṃ

mahattamāgraṇya urukramātmanaḥ|

yudhiṣṭhiro daityapatermudā yutaḥ

papraccha bhūyastanayaṃ svayambhuvaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवन्मय प्रह्लादजीके साधुसमाजमें सम्मानित पवित्र चरित्र सुनकर संतशिरोमणि युधिष्ठिरको बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने नारदजीसे और भी पूछा॥ १॥

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