श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.16

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

वार्ता विचित्रा शा१लीनयायावरशिलोञ्छनम्।

विप्रवृत्तिश्‍चतुर्धेयं श्रेयसी चोत्तरोत्तरा॥ १६

vārtā vicitrā śālīnayāyāvaraśiloñchanam|

vipravṛttiścaturdheyaṃ śreyasī cottarottarā|| 16

अर्थ

ब्राह्मणके जीवन-निर्वाहके साधन चार प्रकारके हैं—वार्ता१, शालीन,२ यायावर३ और शिलोञ्छन४। इनमेंसे पीछे-पीछेकी वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं॥ १६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—शालीना यावज्जीवं शिलोञ्छनम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 876)
  2. १

    यज्ञाध्ययनादि कराकर धन लेना।

    (मुद्रित पृष्ठ 876)
  3. २

    बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीमें निर्वाह करना।

    (मुद्रित पृष्ठ 876)
  4. ३

    नित्यप्रति धान्यादि माँग लाना।

    (मुद्रित पृष्ठ 876)
  5. ४

    किसानके खेत काटकर अन्‍न घरको ले जानेपर पृथ्वीपर जो कण पड़े रह जाते हैं, उन्हें ‘शिल’ तथा बाजारमें पड़े हुए अन्‍नके दानोंको ‘उञ्छ’ कहते हैं। उन शिल और उञ्छोंको बीनकर अपना निर्वाह करना ‘शिलोञ्छन’ वृत्ति है।

    (मुद्रित पृष्ठ 876)

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