ब्राह्मणके जीवन-निर्वाहके साधन चार प्रकारके हैं—वार्ता१, शालीन,२ यायावर३ और शिलोञ्छन४। इनमेंसे पीछे-पीछेकी वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं॥ १६॥
वार्ता विचित्रा शालीनयायावरशिलोञ्छनम्।
विप्रवृत्तिश्चतुर्धेयं श्रेयसी चोत्तरोत्तरा॥ १६
ब्राह्मणके जीवन-निर्वाहके साधन चार प्रकारके हैं—वार्ता, शालीन, यायावर और शिलोञ्छन। इनमेंसे पीछे-पीछेकी वृत्तियाँ अपेक्षाकृत श्रेष्ठ हैं॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.11.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 876) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/11/16/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—शालीना यावज्जीवं शिलोञ्छनम्।
(मुद्रित पृष्ठ 876)
१
यज्ञाध्ययनादि कराकर धन लेना।
(मुद्रित पृष्ठ 876)
२
बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीमें निर्वाह करना।
(मुद्रित पृष्ठ 876)
३
नित्यप्रति धान्यादि माँग लाना।
(मुद्रित पृष्ठ 876)
४
किसानके खेत काटकर अन्न घरको ले जानेपर पृथ्वीपर जो कण पड़े रह जाते हैं, उन्हें ‘शिल’ तथा बाजारमें पड़े हुए अन्नके दानोंको ‘उञ्छ’ कहते हैं। उन शिल और उञ्छोंको बीनकर अपना निर्वाह करना ‘शिलोञ्छन’ वृत्ति है।