श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.20

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सत्यानृतं तु वाणिज्यं श्‍ववृत्तिर्नीचसेवनम्।

वर्जयेत् तां सदा विप्रो राजन्यश्‍च जुगुप्सिताम्।

सर्ववेदमयो विप्रः सर्वदेवमयो नृपः॥ २०

satyānṛtaṃ tu vāṇijyaṃ śvavṛttirnīcasevanam|

varjayet tāṃ sadā vipro rājanyaśca jugupsitām|

sarvavedamayo vipraḥ sarvadevamayo nṛpaḥ|| 20

अर्थ

वाणिज्य ‘सत्यानृत’ है और निम्नवर्णकी सेवा करना ‘श्वानवृत्ति’ है। ब्राह्मण और क्षत्रियको इस अन्तिम निन्दित वृत्तिका कभी आश्रय नहीं लेना चाहिये। क्योंकि ब्राह्मण सर्ववेदमय और क्षत्रिय (राजा) सर्वदेवमय है॥ २०॥

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