vedadṛgbhiḥ smṛto rājanpretya ceha ca śarmakṛt|| 31
अर्थ
वेददर्शी ऋषि-मुनियोंने युग-युगमें प्रायः मनुष्योंके स्वभावके अनुसार धर्मकी व्यवस्था की है। वही धर्म उनके लिये इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी है॥ ३१॥
प्रायः स्वभावविहितो नृणां धर्मो युगे युगे।
वेददृग्भिः स्मृतो राजन्प्रेत्य चेह च शर्मकृत्॥ ३१
वेददर्शी ऋषि-मुनियोंने युग-युगमें प्रायः मनुष्योंके स्वभावके अनुसार धर्मकी व्यवस्था की है। वही धर्म उनके लिये इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.11.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 878) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/11/31/