श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.10

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

कल्पयित्वाऽऽत्मना यावदाभासमिदमीश्‍वरः।

द्वैतं तावन्‍न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः॥ १०

kalpayitvā''tmanā yāvadābhāsamidamīśvaraḥ|

dvaitaṃ tāvanna viramet tato hyasya viparyayaḥ|| 10

अर्थ

जबतक यह जीव आत्मसाक्षात्कारके द्वारा इन देह और इन्द्रियोंको प्रतीतिमात्र निश्‍चय करके स्वतन्त्र नहीं हो जाता, तबतक ‘मैं पुरुष हूँ और यह स्त्री है’—यह द्वैत नहीं मिटता और तबतक यह भी निश्चित है कि ऐसे पुरुष यदि स्त्रीके संसर्गमें रहेंगे, तो उनकी उनमें भोग्यबुद्धि हो ही जायगी॥ १०॥

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