श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.14

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

दत्त्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्‍वरः।

गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत्॥ १४

dattvā varamanujñāto guroḥ kāmaṃ yadīśvaraḥ|

gṛhaṃ vanaṃ vā praviśet pravrajet tatra vā vaset|| 14

अर्थ

फिर यदि सामर्थ्य हो तो गुरुको मुँहमाँगी दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद उनकी आज्ञासे गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे या आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए उसी आश्रममें रहे॥ १४॥

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