श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.30

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अप्सु क्षितिमपो ज्योतिष्यदो वायौ नभस्यमुम्।

कूटस्थे तच्च महति तदव्यक्तेऽक्षरे च१ तत्॥ ३०

apsu kṣitimapo jyotiṣyado vāyau nabhasyamum|

kūṭasthe tacca mahati tadavyakte'kṣare ca tat|| 30

अर्थ

साथ ही पृथ्वीका जलमें, जलका अग्‍निमें, अग्‍निका वायुमें, वायुका आकाशमें, आकाशका अहंकारमें, अहंकारका महत्तत्त्वमें, महत्तत्त्वका अव्यक्तमें और अव्यक्तका अविनाशी परमात्मामें लय कर दे॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तु।

    (मुद्रित पृष्ठ 883)

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