॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.13.17
न ते शयानस्य निरुद्यमस्य
ब्रह्मन् नु हार्थो यत एव भोगः।
अभोगिनोऽयं तव विप्र देहः
पीवा यतस्तद्वद नः क्षमं चेत्॥ १७
na te śayānasya nirudyamasya
brahman nu hārtho yata eva bhogaḥ|
abhogino'yaṃ tava vipra dehaḥ
pīvā yatastadvada naḥ kṣamaṃ cet|| 17
अर्थ
भगवन्! आप कोई उद्योग तो करते नहीं, यों ही पड़े रहते हैं। इसलिये आपके पास धन है नहीं। फिर आपको भोग कहाँसे प्राप्त होंगे? ब्राह्मणदेवता! बिना भोगके ही आपका यह शरीर इतना हृष्ट-पुष्ट कैसे है? यदि हमारे सुननेयोग्य हो, तो अवश्य बतलाइये॥ १७॥