श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.28

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

जलं तदुद्भवैश्छन्‍नं हित्वाज्ञो जलकाम्यया।

मृगतृष्णामुपाधावेद् यथान्यत्रार्थदृक् स्वतः॥ २८

jalaṃ tadudbhavaiśchannaṃ hitvājño jalakāmyayā|

mṛgatṛṣṇāmupādhāved yathānyatrārthadṛk svataḥ|| 28

अर्थ

जैसे अज्ञानी मनुष्य जलमें उत्पन्‍न तिनके और सेवारसे ढके हुए जलको जल न समझकर जलके लिये मृगतृष्णाकी ओर दौड़ता है, वैसे ही अपनी आत्मासे भिन्‍न वस्तुमें सुख समझनेवाला पुरुष आत्माको छोड़कर विषयोंकी ओर दौड़ता है॥ २८॥

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