श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.3

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

एक एव चरेद् भिक्षुरात्मारामोऽनपाश्रयः।

सर्वभूतसुहृच्छान्तो नारायणपरायणः॥ ३

eka eva cared bhikṣurātmārāmo'napāśrayaḥ|

sarvabhūtasuhṛcchānto nārāyaṇaparāyaṇaḥ|| 3

अर्थ

संन्यासीको चाहिये कि वह समस्त प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त रहे, भगवत्परायण रहे और किसीका आश्रय न लेकर अपने-आपमें ही रमे एवं अकेला ही विचरे॥ ३॥

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