मनुष्य सर्वदा शारीरिक, मानसिक आदि दुःखोंसे आक्रान्त ही रहता है। मरणशील तो है ही, यदि उसने बड़े श्रम और कष्टसे कुछ धन और भोग प्राप्त कर भी लिया तो क्या लाभ है?॥ ३०॥
आध्यात्मिकादिभिर्दुःखैरविमुक्तस्य कर्हिचित्।
मर्त्यस्य कृच्छ्रोपनतैरर्थैः कामैः क्रियेत किम्॥ ३०
मनुष्य सर्वदा शारीरिक, मानसिक आदि दुःखोंसे आक्रान्त ही रहता है। मरणशील तो है ही, यदि उसने बड़े श्रम और कष्टसे कुछ धन और भोग प्राप्त कर भी लिया तो क्या लाभ है?॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 887) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/30/