श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.13.32

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

राजतश्चोरतः शत्रोः स्वजनात्पशुपक्षितः।

अर्थिभ्यः कालतः स्वस्मान्‍नित्यं प्राणार्थवद्भयम्॥ ३२

rājataścorataḥ śatroḥ svajanātpaśupakṣitaḥ|

arthibhyaḥ kālataḥ svasmānnityaṃ prāṇārthavadbhayam|| 32

अर्थ

जो जीवन और धनके लोभी हैं—वे राजा, चोर, शत्रु, स्वजन, पशु-पक्षी, याचक और कालसे, यहाँतक कि ‘कहीं मैं भूल न कर बैठूँ, अधिक न खर्च कर दूँ’—इस आशंकासे अपने-आपसे भी सदा डरते रहते हैं॥ ३२॥✎ 1979

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1979 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अपने-आप → अपने-आपसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें