॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.13.36
अनीहः परितुष्टात्मा यदृच्छोपनतादहम्।
नो चेच्छये बह्वहानि महाहिरिव सत्त्ववान्॥ ३६
anīhaḥ parituṣṭātmā yadṛcchopanatādaham|
no cecchaye bahvahāni mahāhiriva sattvavān|| 36
अर्थ
मैं अजगरके समान निश्चेष्ट पड़ा रहता हूँ और दैववश जो कुछ मिल जाता है, उसीमें सन्तुष्ट रहता हूँ और यदि कुछ नहीं मिलता, तो बहुत दिनोंतक धैर्य धारण कर यों ही पड़ा रहता हूँ॥ ३६॥