मनुष्योंके स्वभाव भिन्न-भिन्न होते ही हैं। अतः न तो मैं किसीकी निन्दा करता हूँ और न स्तुति ही। मैं केवल इनका परम कल्याण और परमात्मासे एकता चाहता हूँ॥ ४२॥
नाहं निन्दे न च स्तौमि स्वभावविषमं जनम्।
एतेषां श्रेय आशासे उतैकात्म्यं महात्मनि॥ ४२
मनुष्योंके स्वभाव भिन्न-भिन्न होते ही हैं। अतः न तो मैं किसीकी निन्दा करता हूँ और न स्तुति ही। मैं केवल इनका परम कल्याण और परमात्मासे एकता चाहता हूँ॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 888) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/42/